जम्मू कश्मीर राज्य के पुनर्गठन और उसके विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त किए जाने के संदर्भ में दो बातें

जम्मू कश्मीर राज्य के पुनर्गठन और उसके विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त किए जाने के संदर्भ में दो बातें

अखिलेंद्र प्रताप सिंह, स्वराज अभियान

राष्ट्रपति ने संसद द्वारा पारित जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल और उसे मिले विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करने पर अपनी मुहर लगा दी है। लेकिन देश का लोकतांत्रिक मत इसके विरूद्ध है और कश्मीर की जनभावना के साथ है। कश्मीरी पंडितों का भी एक हिस्सा इससे खुश नहीं दिख रहा है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि राष्ट्रीय आजादी के आंदोलन और उसकी राष्ट्र निर्माण की सोच का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ धुर विरोधी रहा है। संघ ने कभी भी भारत की विविधता और उसके संघीय सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया। उसकी सोच ख्याली और अधिनायकवादी रही है। संघ ने पूरे भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया और उसकी भौगोलिक जन केंद्रित व्याख्या की जगह भू-सांस्कृतिक धार्मिक व्याख्या की। विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी ‘हिंदुत्व’ की किताब में हिंदू की परिभाषा इस प्रकार की है -

आसिन्धु-सिंधु-पर्यन्ता यस्य भारतभूमिका

पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।

हिंदू वह है जो सिंधु नदी से समुद्र तक संपूर्ण भारत वर्ष को अपनी पितृ भूमि और पुण्य भूमि मानता हो। स्वतः स्पष्ट है कि पहले भारत को हिंदू राष्ट्र मानिये, यहां के नागरिकों को हिंदू कहिये और हिंदू भी उन्हें कहिये जो भारत को पितृ भूमि और पुण्य भूमि दोनों मानता हो। इस सिद्धांत के अनुसार मुस्लिम, ईसाई सहित अन्य धर्मावलम्बी धार्मिक-सांस्कृतिक गुलामी में रहने के लिए अभिशप्त हैं। दीनदयाल उपाध्याय जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बड़े राजनीतिक नेता रहे हैं, उनकी समझ देखिये। एकात्म मानववाद में वह कहते हैं कि भारत का संविधान संघीय न होकर एकात्मवादी होना चाहिए। भारत माता के अंग के बतौर वे प्रदेश को तो स्वीकार करते हैं लेकिन उन्हें स्वायत्त संघीय राज्य व्यवस्था स्वीकार नहीं है। यदि कोई कहे कि भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र शासित प्रदेश की अपनी परिकल्पना को ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित राज्यों के निर्माण में व्यक्त किया है तो कतई गलत नहीं होगा। इसी तरह का प्रयोग भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में करे तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए। क्योंकि यह उसके अधिनायकवादी राज्य व्यवस्था के विचार के अनुरूप है। संसदीय जनतंत्र भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर्वसत्तावादी राजनीतिक सोच से मेल नहीं खाता है। संसदीय जनतंत्र को संघ बालू के अलग-अलग कण के रूप में देखता है। मौका मिलते ही मौजूदा राजनीतिक ढांचे को पलट देने में उसे देर नहीं लगेगी।

संविधान की अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन पर संसद में बोलते हुए गृह मंत्री ने कहा कि 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर का जब भारत में संम्मिलन (इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेसन) हुआ, उस समय उसे विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया गया। हालांकि तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह के बेटे कर्ण सिंह का कहना है कि उस समय हुए समझौते में जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात मानी गयी थी। जिसे बाद में अनुच्छेद 370 के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया। यह सभी जानते हैं कि भारत वर्ष में 562 राजा-रजवाड़ों व नवाबों की रियासतें थीं। उन्हें या तो भारत या पाकिस्तान के साथ जाना था या स्वतंत्र रहना था। राजा हरि सिंह जिनका आरएसएस के साथ अच्छा रिश्ता था, वे अपनी रियासत को स्वतंत्र बनाये रखना चाहते थे और भारत के साथ तभी जुड़े जब पाकिस्तानी सेना के साथ पख्तून जनजातीय समूह जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने के लिए श्रीनगर तक पहुंच गया। यहां शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस और उसकी कतारें जो सामंतवाद विरोधी संघर्ष की अगुवाई कर रही थी उन्होंने भारतीय सेना की पूरी मदद की और पाकिस्तानी सेना और कबीलों को पीछे ढकेला। शेख अब्दुल्ला ने धर्म आधारित जिन्ना के द्विराष्ट्र के सिद्धांत को कभी नहीं स्वीकार किया और भारत के साथ रहने का फैसला किया। इतिहास में दर्ज इस सच को संघ का संकीर्ण मन स्वीकार नहीं कर पाता है। देशी राजा-रजवाड़ों और नवाबों को भारत में विलय कराने के लिए जनसंघर्षों व जनता की जो भूमिका थी उसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बराबर नकारता है और इतिहास को राजा-रानियों और नवाबों की कहानियों में तब्दील करता रहता है। यह निर्विवाद है कि आंध्र महासभा और कम्युनिस्टों की अगुवाई में तेलंगाना के जुझारू किसान आंदोलन ने निजाम हैदराबाद के निरंकुश राज्य की कमर तोड़ दी और भारत में उसे विलय कराने में बड़ी भूमिका निभाई। जूनागढ़ की कहानी भी जनता के संघर्ष की कहानी है। भारत की जनता की एकता ने भारतीय राष्ट्र-राज्य के उदय में बड़ी भूमिका निभाई है जिसे नजर अंदाज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इतिहासकार ही कर सकते हैं।

दरअसल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसकी भारतीय जनता पार्टी हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं। गलतबयानी उनके राजनीतिक चरित्र का स्वभाव है। गृहमंत्री महोदय ने संसद में बताया कि संविधान की अनुच्छेद 370 का विरोध लोहिया जी ने किया था। संसद में किसी एक प्राईवेट बिल पर हुई बहस के हवाले से संघ के लोग कहते हैं कि लोहिया ने संसद में अनुच्छेद 370 को हटाने की बात कही थी, जबकि उनके प्रकाशित दस्तावजों में ऐसा कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता है। लोहिया जी शेख अब्दुल्ला और नेशनल कांफ्रेंस के बड़े प्रशंसक थे। जहां तक डाक्टर अम्बेडकर की बात है उनकी किसी रचना में यह बात नहीं मिलती है कि वे अनुच्छेद 370 को भारतीय संविधान में डालने के वह खिलाफ ंथे। यह सब बातें संघ की मनगढ़ंत कहानियों में है जो भारतीय जनसंघ के नेता बलराज मधोक के कथित कथन पर आधारित है।

संविधान की अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और जम्मू-कश्मीर राज्य को केंद्र शासित दो प्रदेश में बदल देने के फायदे का जो तर्क दिया रहा है उसमें भी कोई दम नहीं है। जहां तक अनुच्छेद 370 को हटाने की बात है, वह तो महज एक पर्दा मात्र ही रह गया था। नेहरू के जमाने में भी उसमें ढेर सारे बदलाव हुए और अनुच्छेद 370 के रहते हुए भी भारतीय संविधान के ढेर सारे प्रावधान वहां लागू हो रहे थे। जन कल्याण और राजनीतिक आरक्षण संबंधी प्रावधान भी संविधान संशोधन कर वहां लागू किया जा सकता था। अनुच्छेद 370 के रहते वहां बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते थे तो इस तरह की व्यवस्था देश के कई अन्य राज्यों में भी है। आदिवासियों की जमीन भी गैर आदिवासी नहीं खरीद सकते हैं। यदि सरकार विकास के मामले में दिलचस्पी लेती तो उद्योग-धंधों व विकास कार्यों के लिए बहुत सारी जमीनें वहां लीज पर ली जा सकती थी। वैसे भी कई अन्य राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर विकास के पायदान पर आगे है। जहां तक आतंकवाद से लड़ने की बात है उसमें संविधान की अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर राज्य बाधक था, यह समझ के परे है। लगभग 7 लाख अर्द्धसैनिक व सैनिक बलों की तैनाती उस राज्य में है और सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ्स्सा) जैसा काला कानून वहां मौजूद है। इतनी कम जनसंख्या पर इतनी भारी फोर्स लगाने के बाद भी अलगाववाद और आतंकवाद से अगर नहीं निपट सके तो जम्मू-कश्मीर की पूरी समस्या को हल करने के लिए नई राजनीतिक दृष्टि और पहल की जरूरत थी न कि राज्य का ही विलोपन कर देना। यह भी कहना गलत है कि अनुच्छेद 370 की वजह से वहां अलगाववाद की भावना पनपी। सन् 1947 से लेकर 1987 तक वहां आतंकवाद की घटनायें नहीं थीं और न ही कट्टर इस्लाम का प्रभाव। अलगाववादी आंदोलन बढ़ने के अन्य कारणों में एक बड़ा कारण वहां चुनाव में बड़े स्तर पर हुई धांधली थी जिसे अपना तर्क मजबूत करने के लिहाज से गृह मंत्री ने संसद में स्वीकार किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों का यह कहना कि कुछ ऐसे ज्वलंत सवाल हैं जिसे हल करके राज्य की पुनर्बहाली कर दी जायेगी। कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास किया जायेगा, शरणार्थियों को नागरिकता दी जायेगी और राजनीतिक आरक्षण का मसला हल किया जायेगा। सामरिक कारण भी दिये गये हैं कि लद्दाख को केन्द्र शासित राज्य बनाने से सियाचीन पर अच्छी नजर रखी जा सकती है। आखिर जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी की मिली जुली सरकार थी और अभी वहां उन्हीं का राज्यपाल है। इन प्रश्नों का हल राज्य सरकार या राज्यपाल के माध्यम से किया जा सकता था। इसके लिए राज्य के विलोपन की कोई जरूरत नहीं थी। उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि संघ और भारतीय जनता पार्टी अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने और राज्य के विलोपन का जो तर्क दे रहे हैं वह वास्तविक नहीं है। कारण वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक हैं, इसे इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

यह तो सबको मालूम है कि भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का रणनीतिक लक्ष्य है और इस तरह के हिंदुत्व प्रोग्राम वे बराबर लेते रहेंगे। आने वाले दिनों में वे कामन सिविल कोड, राम मंदिर जैसे मुद्दों को उठायेंगे और पूरे भारतीय समाज का हिंदुकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण करते रहेंगे। लेकिन उनकी राजनीति के राजनीतिक अर्थशास्त्र को भी समझना होगा। नव उदारवादी अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। दुनिया में बेरोजगारी और मंदी का दौर है और यहां भी उससे उबरने की क्षमता केंद्र सरकार के पास नहीं दिख रही है। नव उदारवादी अर्थव्यवस्था अपनी जरूरत के हिसाब से एक अधिनायकवादी राजनीतिक माडल विकसित कर रही है और इसके लिए उसका सबसे विश्वसनीय दल इस समय भाजपा बनी हुई है। इसके पहले भी गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम संशोधन विधेयक (यूएपीए) और सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक संसद में भाजपा पास करा चुकी है। कुछ सामरिक कारण भी हैं उस पर भी गौर करना चाहिए। अमरीका चीन के साथ व्यापारिक युद्ध में लगा हुआ है और चीन को घेरने में वह एशिया में भारत की बड़ी भूमिका देखता है। हालांकि चीन के साथ भारत का व्यापारिक संबंध बढ़ रहा है लेकिन भारत विश्व राजनीति में अमरीका से रणनीतिक तौर पर बंध गया है और यही वजह है कि अन्य कारणों के अलावा चीन के ‘वन बेल्ट-वन रोड‘ कार्यक्रम का भारत विरोध भी करता है। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ शुरू से ही भारत को अटलांटिक ग्रुप के साथ ले जाने का पैरोकार रहा है। कहने का मतलब यह है कि सामरिक दृष्टि से इस क्षेत्र का महत्व और बढ़ गया है। यह भी हो सकता है कि किसी बड़ी योजना के तहत जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में मध्यस्थता करने का बयान अमरीकीे राष्ट्रपति का हो। क्यांेकि पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान और आक्साई चीन जैसी जगहें बड़ी सामरिक महत्व की हैं और अमेरीका की दिलचस्पी इनमें बराबर रही है। बहरहाल जो भी हो जम्मू कश्मीर के जानकार यह मानतें है कि केंद्र सरकार का यह कदम आतंकवाद को घटाने की जगह बढ़ायेगा ही। यह सच भी है क्योंकि देश की आजादी के आंदोलन के दौर में कश्मीर को भारत से जोड़ने के लिए जो राजनीतिक व्यवस्था तय की गयी थी, वह आम समझ और सहमति के आधार पर बनी थी। उस पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को पलट कर केन्द्र शासित प्रदेश की जो राजनीतिक व्यवस्था केन्द्र सरकार जम्मू कश्मीर के लिए दे रही है, वह राजनीतिक यथार्थ के विरूद्ध है। क्योंकि कल बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था अगर हो भी जाए तो भी वह राजनीतिक सवालों का विकल्प नहीं बन सकती और कश्मीरी अवाम के अलगाव की भावना को दूर नहीं कर सकती है।

राजनीतिक प्रश्न राजनीतिक तरीके से ही हल होते है, उसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक प्रक्रिया से लोगों को दरकिनार करके अभी तक कश्मीर के सवाल को हल किया जाता रहा है। मोदी सरकार भले आज जम्मू कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश की संवैधानिक व्यवस्था दें लेकिन यह भी सच है कि उनके साथ सन् 1953 से ही केन्द्र शासित प्रदेश जैसा व्यवहार होता रहा है। यहां तक कि वहां के लोग न वोट दे पाते थे और न अपना प्रतिनिधि चुन पाते थे और उनके बाजार पर भी दिल्ली के महाजनों का ही कब्जा रहा है। इन विसंगतियों को दूर करने की जगह मोदी सरकार के मौजूदा कदम ने वहां की जनता को राजनीतिक प्रक्रिया से एकदम अलग-थलग कर दिया है। जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन का और विशेष राज्य के दर्जे की समाप्ति के लिए केन्द्र सरकार का उठाया गया कदम दुस्साहसिक है।

जम्मू कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया की पुनर्बहाली और उसमें वहां के लोगों की भागेदारी को बढ़ाने की जरूरत है। देश के लोकतांत्रिक आंदोलन को इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए और वहां की जनता को विश्वास में लेना चाहिए कि देश के अन्य हिस्सों की जनता उनके साथ है।