शिवपाल 'साइकिल' के साथ तो हो सकते हैं सवारी नहीं कर सकते

शिवपाल 'साइकिल' के साथ तो हो सकते हैं सवारी नहीं कर सकते

नई दिल्ली: 2017 में देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश चुनावी परीक्षा की गवाही के लिये तैयार था। उस चुनावी अखाड़े में पहलवानों की लड़ाई पर हर किसी की नजर लगी थी। लेकिन उससे पहले मुलायम सिंह यादव के कुनबे में भी जंग छिड़ी थी। सवाल वजूद बचाने और अपने परचम को लहराने का था। उस लड़ाई में बाजी अखिलेश यादव के हाथ लगी और चाचा यानि शिवपाल यादव चुनावी लड़ाई की एक किस्त हार चुके थे। राजनीति की सड़क पर उन्हें अपनी साइकिल दौड़ानी थी और उसके लिए उन्होंने नई पार्टी का गठन किया जिसे प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया का नाम दिया।

हाल ही में इस तरह की खबरें आ रही थीं कि चाचा और भतीजा यानि अखिलेश यादव एक मंच पर दोबारा नजर आएंगे। लेकिन शिवपाल यादव ने स्पष्ट तौर इस तरह कि किसी भी संभावना से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि अब दोबारा समाजवादी पार्टी की हिस्सा बनने का सवाल ही नहीं है। जहां तक साथ होकर चुनाव लड़ने की बात है कि उसके बारे में सोचा जा सकता है।

जानकारों का कहना है कि आम चुनाव 2019 में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया को फायदा भले ही न मिला हो समाजवादी को करारी हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि फिरोजाबाद की पारंपरिक सीट को बचाने में सपा नाकाम रही। शिवपाल यादव के चुनावी मैदान में आ जाने की वजह से एसपी प्रत्याशी अक्षय यादव यानि रामगोपाल यादव के बेटे को हार का सामना करना पड़ा था। हाल ही में इस तरह की खबरें थी कि समाजवादी पार्टी शिवपाल यादव की सदस्यता को खत्म करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष से सिफारिश कर सकती है। लेकिन सपा ने इस फैसले पर आगे बढ़ने से हाथ खींच लिए और ऐसा माना जाने लगा कि दोनों दलों के बीच सुलह हो सकती है।

यूपी की राजनीति को समझने वाले मानते हैं कि समाजवादी पार्टी भले ही आधुनिक तौर तरीकों से बढ़ने की कोशिश कर रही हो अभी भी जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भरोसा शिवपाल यादव में बरकरार है। अगर 2019 के चुनावी नतीजों की बात करें तो बदायूं और फिरोजाबाद के चुनाव को उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं । बदायूं सीट से जहां धर्मेंद्र यादव को हार का सामना करना पड़ा वहीं फिरोजाबाद सीट का सपा से निकलने का मतलब अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव की सीधी हार थी।