नीरो चुनावी भोजन कर रहे थे और दिल्ली जल रही थी

नीरो चुनावी भोजन कर रहे थे और दिल्ली जल रही थी

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ।नीरो उस राज्य के हिसाब से भोजन कर रहे थे जिस राज्य में चुनाव होने संभावित है जबकि गुजरात मॉडल दिल्ली में अपनी कहानी दोहराने पर लगा था वहीं महीना लगभग उसी तारीख़ों के आसपास जिस महीने में गुजरात मॉडल की परिकल्पना की गई थी उसी महीने में दिल्ली के चार क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाने को विवस होना पड़ा जिसमें पचास से भी अधिक लोगों ने इस बार भी नफ़रत की इस आग में अपनी जानें दे दी।नीरो ने शांति की सीधे अपील करने में ही इतना वक़्त लगा दिया जब नीरो ने शांति की अपील की उससे पहले ही अमन पसंद हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई निकल पड़े थे आपसी प्यार मोहब्बत बचाने के लिए लेकिन सियासी महारथियों को ये सुध नहीं आई कि नफ़रत की राजनीति से फैली इस आग को बुझाने के लिए पहल की जाए।दिल्ली में सातों संसदीय क्षेत्रों में मोदी की भाजपा के ही प्रतिनिधि हैं। उत्तर पूर्वी दिल्ली , जहां फैली हिंसा में अब तक पचास से अधिक लोगों की जान गई है, वहाँ के सांसद मनोज तिवारी दिल्ली मोदी की भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। गौतम गंभीर के अलावा दिल्ली के किसी सांसद ने दिल्ली की हिंसा पर कोई उल्लेखनीय बात कही हो ऐसा याद नहीं आ रहा। हंसराज हंस की गायकी ख़ामोश है, वकील मीनाक्षी लेखी कानून की बात से कन्नी काट कर चुप बैठी हैं।नियमित रूप से मन की बात करने वाले प्रधानमंत्री दिल्ली की हिंसा पर तीन दिन बाद सिर्फ एक ट्वीट कर देते हैं।याद कीजिए जब गुजरात के पाटीदार आंदोलन में हिंसा हुई थी तो प्रधानमंत्री टीवी के ज़रिये जनता के नाम संदेश देने आ गये थे। प्रधानमंत्री के प्रिय गृहमंत्री उनको दिल्ली जीतकर नहीं दे पाए तो दिल्ली में ऐसा माहौल बनने दिया जिसकी परिणति सांप्रदायिक हिंसा में हुई।यह निज़ाम चुना है हमने अपनी हिफ़ाज़त, तरक्क़ी और रहबरी के नाम पर।आधी रात का तबादला।सिख दंगों में कांग्रेसी सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा देने वाले जस्टिस मुरलीधर को दिल्ली दंगों में भाजपा नेताओं पर कार्यवाई सरकार को इतनी अखर गई कि उनका आधी रात में ही तबादला करवा दिया गया सुप्रीम कोर्ट को सुझाव देकर।लगा किसी जज का नही बड़े बाबू का तबादला किया गया।पर इसकी आम लोगों में अच्छी प्रतिक्रिया नही हो रही है।सरकार , पार्टी की साख पर इसका असर पड़ना तय है।लोगों का सिर्फ एक सवाल है कि आधी रात को तबादला करने की क्या आफत आ गई थी ?दंगा रोकने के लिए ऐसी तत्परता तो सरकार ने दिखाई नही फिर एक जस्टिस के तबादले की ऐसी क्या हड़बड़ी थी।पुलिस तो वैसे भी वही कर रही थी जो सरकार चाहती थी।दिल्ली दंगों के बीच जब दंगाइयों को मजहब और राजनीति के हिसाब से बांटकर देखा जा रहा है तभी ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने सनक के इस भयंकर दौर में बंटने और बांटने की राजनीति से इनकार कर दिया।दिल्ली दंगे को कवर करने गए कई पत्रकारों ने लिखा है कि हिन्दू और मुसलमान के बीच ऐसा भयंकर दंगा कभी नहीं देखा , उन्हें लगा है कि भरोसे की हर दीवार ढहा दी गई है, लेकिन उन्हीं खंडहरों से ऐसी कहानियां भी निकल कर आ रही हैं जो यकीन पैदा करती हैं कि दिल्ली अपनी इस ग़लती पर अफ़सोस करेगी और भरोसे की नई दीवार भी बनेगी।हमारे पास एक सीसीटीवी फुटेज कहीं से घूमते हुए आया , इस वीडियो में एक मुस्लिम नौजवान भागा जा रहा है , उसके पीछे डंडे लेकर उग्र हिन्दुत्व के दंगाइयों की टोली दौड़ी जा रही है , वह गिर जाता है और डंडे पड़ने लगते हैं , तभी इस वीडियो से पता चलता है कि गली के रहने वाले लोग बाहर निकलते हैं और दंगाइयों को भगाते हैं और मुस्लिम नौजवान को बचा लेते हैं , काफी ध्यान से देखने पर लगता है कि इसमें सिख समुदाय के लोग हैं , इस घर में वह मुस्लिम लड़का जाता हुआ दिखता है , लगता है कि बच गया है। यह गहरे क्षोभ और शोक की घड़ी थी दिल्ली की हिंसा के बीच राजधानी में सक्रिय गांधीवादी लोग ने हिंसाग्रस्त इलाकों में शांति और विश्वास का माहौल बनाने के लिए और राहत कार्य के लिए सड़कों पर उतर कर शांति अभियान की पहल की है। गांधीजनों ने अपनी इस पहल को महात्मा गांधी के 150वीं जन्मजयंती वर्ष में उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि कहा है और देशभर के गांधीवादियों से भी इसी दिशा में काम करने की उम्मीद जताई है।राजधानी के हालात से चिंतित गांधीजनों ने देश और सरकार के नाम एक अपील जारी करके राजधानी के उत्तरपूर्वी इलाके में हुई हिंसा पर गहरा क्षोभ और शोक व्यक्त किया है‌।उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा के तांडव के बीच समाज में अमन भरोसा और भाईचारा कायम करने और राहत के काम के लिए सक्रिय हस्तक्षेप के इरादे से बुधवार को गाँधी शांति प्रतिष्ठान में सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक बैठक हुई।इस बैठक के बाद गुरुवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही और गांधी संग्रहालय के निदेशक ए अन्नामलाई के हस्ताक्षरों से जारी साझा वक्तव्य में हिंसा के इस सैलाब में 50 से ज़्यादा मौतों को केंद्र सरकार की प्रशासनिक नाकामी की शर्मनाक मिसाल कहा गया। गांधीजनों ने केंद्र सरकार के साथ-साथ अपनी राजनीतिक-सामाजिक और नैतिक भूमिका निभाने में विफलता के लिए दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को भी कठघरे में खड़ा किया है।इस बैठक में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता दया सिंह (अध्यक्ष, आल इंडिया पीस मिशन), जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार , राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक सौरभ बाजपेयी , खुदाई ख़िदमतगार हिंद के संयोजक फैज़ान आरिश और आमिर अंजुम खान समेत अन्य तमाम सामाजिक कार्यकर्त्ता भी मौजूद थे।इन गांधीजनों की राय में नागरिकता कानूनों के मुद्दे पर समाज और सरकार के बीच गहरी असहमतियों ने दिल्ली के शाहीन बाग़ समेत देश के तमाम हिस्सों में चल रहे धरने-प्रदर्शन गांधी की परंपरा का अनुकरणीय उदाहरण हैं।शाहीन बाग़ व देवबन्द और लखनऊ आदि की महिलाओं का सत्याग्रह के प्रतिरोध के तरीक़े में गांधी के तौर-तरीकों का अंश है और लोगों ने हिंसा की ताक़त का मुक़ाबला गांधी के अहिंसा के रास्ते करके दिखाया है।गांधीजनों का यह भी मानना है कि मौजूदा माहौल में अहिंसा की सामाजिक शक्ति को विकसित करना एक चुनौती है लेकिन यह सिर्फ गांधीवादियों की ज़िम्मेदारी नहीं है।सरकार समाज में शांति स्थापना के प्रयासों के लिए आगे आने वाले संगठनों की अपील पर ध्यान नहीं देती है।लिहाज़ा जो लोग भी एक लोकतांत्रिक समाज बनाए रखना चाहते हैं, यह उनकी भी ज़िम्मेदारी है।